गीतिका

किरणें हँसती जब अंचल में !

आधार – तोटक (वर्णिक)
मापनी – 112×4, अथवा सगण ×4
समांत – अल <> पदांत – में
गीतिका —–
मन उत्पल कुंज खिले जल में ।
ठहरी मृदु बूँद कनी दल में ।

वसुधा अपनी छविमान हुई,
किरणें हँसती जब अंचल में !

नव प्रात लिए रवि नंदित है,
यह शुभ्र वितान सजा पल में ।

दिशि रक्तिम भाल सुहाग भरी,
विहगावलि गान करे तल में ।

गुणगान करें मन क्यों उनका,
सत दीन हुआ जब साँकल में ।

नित दर्द सहे जन जीवन जो
उनमाद नशा भरते छल में ।

सत प्रेम सुधा हर आँगन हो
अनुराग भरो कहती कल में ।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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