गीतिका

अमा की रात झंझावात है —

आधार छंद – ‘ आनंदवर्धक छंद ‘
मापनी – 2122 2122 212
समांत – ‘ आत ‘ , पदांत – ‘ है ‘ .
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गीतिका:-
हो उठी जागृत सुहानी रात है।
मौन तारे भी करें जब बात है ।

टिमटिमाते जुगनुओं की पंक्तियां,
है अमा की रात झंझावात है ।

दर्द रिश्तों में जहाँ मिलता रहा,
प्रीति खाती नित वहीं तब मात है।

पास आकर भी नहीं मंजिल मिली,
यह समय का जानिए अप घात है ।

सत्य की राहें अडिग हैं मानिए ,
बात इतनी जो सभी को ज्ञात है ।

है प्रतीक्षा की घड़ी नाजुक बड़ी,
रात्रि का अवसान देता प्रात है ।

गुनगुनाये शून्य भी यह जब कभी,
दे कहीं यह प्रेम की सौगात है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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