गीतिका

राहें बनाती है।

मापनी – 1222 1222 1222 1222
समान्त – आती पदांत – है

गीतिका
नयन से दूर हो जो तुम,उदासी यह न जाती है ।
सुखद यादें जहाँ हर पल,हमें यों ही सताती है ।

तड़पना यह जरूरी है,सही अहसास का होना,
निकट हों फासले मन में,करीबी यह न भाती है ।

चलो अच्छा हुआ अपने,पराये का पता होना,
दुखों में साथ जो अपने,कहानी वह सुहाती है ।

भटकते भाव मधुरिम जो,उबरते डूब कर ही हम,
मुझे तुमसे तुम्हें मुझसे, यही हमको मिलाती है

बनाकर राह बढ़ते खुद,सहज पाते स्वयं को हम,
जहाँ बंधन लगे रिश्ते, न ये चाहत कहाती है ।

सबेरा नित किया करती,चहकती प्रीति अभिलाषा,
महकती शाख वह प्रतिपल,दिवस का मान गाती है ।

सजाया है करीने से, रखी जो प्रेम की पाती,
दिया जो शूल जीवन ने, वही राहें बनाती है ।
डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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