गीतिका

मील के पत्थर

आधार छंद -रजनी
समान्त – आतीं <> पदान्त – हैं
मापनी -2122 2122 2122 2 ,,,,,

गीतिका
दूर तक फैली मुझे राहें बुलाती हैं ।
मील के पत्थर बनों मुझको सिखातीं हैं ।

शांत चिंतन साधना देती सहारा जो,
चेतना की ज्योति वे अंतस जगातीं हैं

नित्य यादों को बुलाकर पास लातीं जो,
मद भरी मुस्कान में मुझको डुबातीं हैं ।

बस गये हो तुम हृदय में शांत उपवन से,
बैठ कर तनहाइयाँ भी गुनगुनातीं हैं ।

प्रेम मन भाया अकेला पन सरस चिंतन,
शांत रजनी स्वप्न आँखों में सजातीं हैं ।

डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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