#गीत

“युग युग से अविरल पावन”

#गीत
युग युग से अविरल पावन है,फूलों से महकी क्यारी ।
रही अनाधिकार शूलों की-घातक उन पर दुश्वारी ।
उजडी़ बगिया फिर खिल जाए,
एक नहीं शाखें अनगिन ।
कली कली ले यौवन गाती,
मुस्कान भरे जो पलछिन ।
हम करें हिमायत काँटों की,क्या है अपनी लाचारी ।
रही अनाधिकार शूलों की- घातक जिन पर दुश्वारी ।
बिखरी परवश पात-पात पर
तन-मन की सुधि बेमानी ।
छीन रहे अम्लान हँसी जो,
अन सुलझे कृत नादानी ।
शांत हुए क्यों देख पुरोधा,जब आयी उनकी बारी ।
रही अनाधिकार शूलों की-घातक जिन पर दुश्वारी ।
खार मनुजता हुई धरा पर,
भरती आहें अँगनाई ।
कल युग के काले पन्ने पर
डरकर जीवै तनहाई ।
राम राज की करें कल्पना,मंथन करिए उपकारी ।
रही अनाधिकार शूलों की-घातक जिन पर दुश्वारी ।
—————डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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