गीतिका

सरस प्रेम को रोपना जानती हूँ !

आधार छंद- भुजंग प्रयात
मापनी -122,122,122,122
समान्त- अना पदान्त – जानती हूँ !
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गीतिका

लिखूँ मैं सहज सर्जना जानती हूँ ।
मिथक को सभी तोड़ना जानती हूँ ।

सधे सिद्धियाँ सत्य आधार माना,
रहित छद्म से अर्चना जानती हूँ ।

दिशा ज्ञान लेकर बढ़ी हर कदम मैं,
नहीं हार को मानना जानती हूँ ।

विकलता न उपहास अज्ञानता वश,
नहीं सुप्त हूँ जागना जानती हूँ ।

जगे लेखनी त्रस्त देखूँ धरा जब,
विकट आपदा रोकना जानती हूँ ।

सुमन पाँखुरी से खिले वाटिका ज्यों,
सरस प्रेम को रोपना जानती हूँ ।

डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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