गीतिका

हो अवतार नहीं है

छंद “सार” अर्ध सम मात्रिक.
शिल्प विधान चौपाई + 12 मात्रा 16+12 28 मात्रा
अंत में 22 वाचिक अनिवार्य
समांत – आर, पदांत – नहीं है
गीतिका
नये दौर में लिखना साथी, अपनी हार नहीं है ।
हैं अतीत के साक्षी हम जो,वे साकार नहीं है ।

बचपन से जो रीति निभायी, देखी दुनिया सारी ,
राग द्वेष मनुहार सहज था,अब आधार नहीं है।

धन बल की छाया में जीवन,है खो रही जवानी
मात पिता की सेवा करने, का सुविचार नहीं है ।

पाठ पढ़ा था कुल मर्यादा,लज्जा थाती गहना,
भाव प्रीति था नत नयनों में,वह शृंगार नहीं है ।

टूट गए है सभी मिथक अब,मिथ्या संसृति जागी,
गोरख धंधे बहु आयामी, सच संचार नहीं है ।

व्यथित हृदय है रोता प्रति पल,करते लोग दिखावा,
दूर करे प्रभु कथित बुराई , हो अवतार नहीं है ।

राष्ट्र प्रेम का भाव हृदय में, बढें़़ पुरोधा आगे,
विश्व पटल पर अपनी गरिमा, का भी पार नहीं है।
————————-डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

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