गीतिका

राजनीति में दंगल

आधार छंद – सरसी
गीतिका —
राजनीति दंगल में देखें,कैसा मचा धमाल ।
मौन धृष्टता करें अराजक,गहरी जिनकी चाल ।

एक एक कर खुले पुलिंदे,भीतर घाती भेद,
नैतिकता का नाम नहीं है,अजब बुना है जाल ।

सत्ता लोलुप आज तुम्हारा,होगा काम तमाम,
कर्म भीरु अब यों कटुता की,नहीं गलेगी दाल ।

कृत्य घातकी देश विरोधी,कितनी भरें उडा़न,
पंख काटते निश्चित अपनी,गिरना उन्हें निढाल ।

कुटिल आचरण अर्थ कामना,भोग वृत्ति अभिमान,
छल-बल घाती कला तुम्हीं ने,अंतस रक्खी पाल ।

बना तमाशा देख रहा जग,खेद मदारी कौन,
आपस की तकरार न छोडे़ सदा बजावें गाल ।

करनी ओछी करने वाले,बचें ईश नाराच,
छद्म प्रेम औ लूट मार को,इन्हे न छोडे़ काल ।
डॉ.प्रेमलता त्रिपाठी

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